तर्ज़- सीता माता की गोदी में हनुमत डारी मूँदर्ड़ी
सुण ज्यो सुण ज्यो जी, गुरु दाता हेलो दीन को जी।
हेलो दीन को जी, फर्योड़ा जीव को जी ॥टेर॥
प्रधान है शुद्ध प्रकृति माया,
निमित्त कारण यह ईश कहाया।
जड़ चेतन की सूक्ष्म गाँठ सूझ नाहीं पड़े जी ॥सु.-111॥
अविद्या जीव उपाधि माया,
यामें कुटस्थ ब्रह्म बिलमाया।
अल्पज्ञ जीव रूप लियो धार, भोगता हो गयो जी ॥सु.-112॥
ईश और जीव उपाधि ऐसी,
रज्जू-सर्प भ्रान्ति जैसी।
ज्ञान दीपक से निर्णय होय, कृपा मुझ पै करो जी ॥सु.-113॥
अनन्त अनादि की राह बतावो,
शान्त अनादि से पिण्ड छुड़ावो।
आदी घर में देवो स्थान, शरण थांकी लियो जी ॥सु.-4॥
नदी एक प्रबल अविद्या भारी,
जामें डूबे नर और नारी।
‘कमला’ लीनी चरण की शरण, हाथ गही तार ज्यो जी ॥सु.-115॥
कमल कुँज प्रकाश — गुरु-महिमा

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Category: Bhajan
