तर्ज़ – बाईसा का वीरा जपसुरिस जाज्यो सा
गुरु दाता थां की बाट निहारूँ सा,
पधारो म्हारे अनमोलो घड़ियाँ। ॥टेर॥
गुरुदाता थां की………
गुरुदाता पलकों पंथ बुहारूँ सा,
बिछाऊँ मग में फूलों की कलियाँ।
गुरुदाता म्हारे आँगण पधारो सा,
संग में तो ल्यावो शिष्यों की टोलियाँ ॥1॥
गुरुदाता थां की………
गुरुदाता (दयालू) चन्दन चौकी बिराजो सा,
तन मन म्हे तो न्यौछावर कर स्याँ।
छप्पन रस रा व्यंजन आप ने जिमाऊँ सा,
परसादी बाँटू अतलियाँ और गलियाँ ॥2॥
गुरुदाता थां की………
गुरुदाता म्हारे सतसंग कर ज्यो सा,
बरसे ली म्हारे अमृत की झड़ियाँ।
गुरुदाता म्हाने ज्ञान सिखवाओ सा,
केटली म्हारी, करमा की कड़ियाँ ॥3॥
गुरुदाता थां की………
तत् त्वम् पद का अर्थ बताओ सा,
मिले ली म्हाने, मुक्ति की गलियाँ।
गुरुदाता म्हाने अनुभव दीज्यो सा,
खुले ली म्हारी हिरदा की अखियाँ ॥4॥
गुरुदाता थां की………
पलकारां मैं तो पांबड़ा बिछाऊँ सा,
गिणूँ ली मैं तो आवणरी घड़ियाँ।
‘कमलेश्वर’ ठाड़ी अरज गुजारैसा,
वगरसाओ म्हाने निजानन्द सेनियाँ ॥5॥
गुरुदाता थां की……..

13 total views, 2 views today
