तर्ज – बेटा सरवन पाणोड़ी पिताय बेटा कहीं तु व्यास लणी
ॐ
॥ पद–13 रघु मारवाड़ी ॥
तर्ज–बेटा सरवन पाणोड़ी पिताय बेटा कहीं तु व्यास लणी
आवो आवो सा गुरु दीन दयाल, थाँने आया शुभ की घड़ी घेर।
आत्म तत्व अति गूढ़ बतायो, गावे वेद पुराण।
गीता भागवत और रामायण, सब ही लीन्हा छाण।
पायो पायो जी मैं, शरणागत में आय ॥थाने॥1
अण्डज और जरायुज, उद्भिज पाई जीवा जूणा।
भ्रम-भ्रम के बहु दुःख पायो, भूल गयो वह मूल।
जासे उत्पत्ति, प्रलय नित होय ॥थाने॥2
ना ही मैं मरूँ नहीं मैं जन्म, नहीं हो आया गोन।
श्यामसुन्दर ने गीता माहीं, प्रकट दिखायो रूप।
वही झिल मिल ज्योति अनूप ॥थाने॥3
भैरूराम गुरु कृपा से दरसया चेतन नूर।
‘कमला’ निज अनुभव कर देख्या पाया सहज स्वरूप।
जा के आश्रित, पिण्ड स्थूल ॥थाने॥4

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